भारतीय संस्कृति को
नष्ट करने का षड्यन्त्र
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आजादी बचाओ आन्दोलन
के प्रणेता एवं भारत
स्वाभिमान के राष्ट्रीय सचिव श्री राजीव
दीक्षित का जन्म एक क्रांतिकारी
परिवार मे 30 नवम्बर
1967 को
उत्तरप्रदेश के नहा गाँव मे हुआ ,
उन्होंने इलाहाबाद
से बीटेक एवं कानपुर से एमटेक किया । वह एक वैज्ञानिक थे , उन्होने
श्री ए पी जे अब्दुल कलाम जी से साथ भी काम किया , उन्होने
फ़्रांस मे दूर संचार क्षेत्र मे भी काम किया । बचपन से वे भगतसिंह,चंद्रशेखर आज़ाद
,सुभासचन्द्र
बोस, गांधीजी
के जीवन चरित्र को पढ़ते थे और उनके विचार से
बहोत प्रभावित हुए ,
जिस तरह चन्द्र शेखर आज़ाद ब्रिटिश और
अँग्रेजी
संस्कृति से पूरी तरह मुक्त भारत चाहते
थे , वैसे
ही राजीव भाई ने आजाद देश
को इन विदेशी मल्टीनेशनल कंपनीयो का
फिरसे ग़ुलाम न बनेने के लिए सम्पूर्ण स्वदेशी
का आंदोलन छेड़ा । इन विदेशी कंपनियो के जीरो टेक्नालजी उत्पादनो के
खिलाफ अभियान छेड़ा और लोगो को अवगत कराया की देश के गरीब तबके को पर्याप्त
रोजगार उपलब्ध कराने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनी के बदले सहकारी कंपनी
के द्वारा बनायीं गयी देशी उत्पादों का उपयोग करना अत्यधिक तार्किक है
। उन्होने आजादी बचाओ आंदोलन संस्था की स्थापना की । यह संस्था देशभर मे विदेशी
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उपभोक्ता सामग्री के क्षेत्र में प्रवेश का
विरोध करती रही । इसके अलावा उन्होने भारत में पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभावों
के प्रति भी लोगों को सचेत कराया । उन्होने नई आजादी उद्घोष नामक
एक पत्रिका भी निकाली ,
इसके अतिरिक्त वे देशभर मे भ्रमण करते
रहे और विभिन्न आर्थिक –
सामाजिक विषयो पर व्याख्यान करके लोगो
मे एक वैचारिक
क्रांति की ज्योत जलायी । उनके मुख्य
व्याख्यान के विषय रहे अंग्रेजी भाषा की
ग़ुलामी , अंतर्राष्ट्रीय
संधियों के मकडजाल में फंसा भारत ,
भारत का सनाकृतिक
पतन , भारत
का स्वर्णिम अतीत ,
भारत की विश्व को देन, भारत निर्माण
योजना , एतिहासिक
भूलें , मांसाहार
से हानियाँ , मौत का व्यापार ,
संगठन की मर्यादा एवं सिद्धांत , संस्कृत
भाषा की वैज्ञानिकता ,
स्वाभिमान सन्देश
, स्वदेशी
से स्वावलंबी भारत ,
विष मुक्त कृषि , व्यवस्था
परिवर्तन
की क्रांति । अपने इस व्याख्यान से
राजीव भाई ने देश के हर वर्ग के नागरिक को
आह्वान किया की वे युग की इस सबसे बड़ी सामाजिक, आध्यात्मिक
व राष्ट्रीय
क्रान्ति से जुड़कर एक स्वस्थ एवं
शक्तिशाली भारत बनाने के लिए व देश का खोया
हुआ स्वाभिमान जगाने के लिए आगे आयें । उनकी आवाज में वेदना थी | उन्होंने
स्वदेशी के माध्यम से देशसेवा का जो बीड़ा उठाया था , इस
महायज्ञ में विघ्न न पड़े इसलिये उन्होंने विवाह नहीं किया और आजीवन
ब्रह्मचर्य
व्रत का पालन किया । वे अपने हाथ से
काती खादी का कुर्ता पैजामा धारण करते थे
।